Mahayuti Split: संभाजीनगर में टूटी 'महायुति'! संजय शिरसाट ने BJP पर लगाया 'दादागिरी' का आरोप, अलग-अलग लड़ेंगे चुनाव

छत्रपति संभाजीनगर मनपा चुनाव (CSMC 2026) में बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) का गठबंधन टूट गया है। मंत्री संजय शिरसाट ने बीजेपी पर अपमान और अहंकार का आरोप लगाया, तो बीजेपी ने पलटवार किया। अब दोनों पार्टियां सभी सीटों पर अलग-अलग लड़ेंगी। जानें पूरी खबर।

Dec 31, 2025 - 19:16
Dec 31, 2025 - 19:33
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Mahayuti Split: संभाजीनगर में टूटी 'महायुति'! संजय शिरसाट ने BJP पर लगाया 'दादागिरी' का आरोप, अलग-अलग लड़ेंगे चुनाव
संभाजीनगर में 'दोस्ती' खत्म, अब 'दंगल' शुरू: महायुति में फूट, संजय शिरसाट बोले-

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): महाराष्ट्र की राजनीति में "फेविकोल के जोड़" की तरह दिखाई देने वाला सत्ताधारी गठबंधन 'महायुति' (Mahayuti) मराठवाड़ा की राजधानी छत्रपति संभाजीनगर में बिखर गया है। आगामी महानगरपालिका चुनाव (CSMC Polls) को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के बीच चल रही रस्साकशी अंततः एक कड़वे अलगाव में बदल गई है।

मंगलवार को शहर की राजनीति में भूचाल आ गया जब शिवसेना के वरिष्ठ नेता और विधायक संजय शिरसाट (Sanjay Shirsat) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके घोषणा की कि उनकी पार्टी अब बीजेपी के साथ गठबंधन नहीं करेगी और सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। उन्होंने बीजेपी के स्थानीय नेतृत्व पर "अहंकार" और "दादागिरी" का खुला आरोप लगाया।

क्या कहा संजय शिरसाट ने? "हमें नौकर समझने की गलती न करें"

शिवसेना (शिंदे गुट) के प्रवक्ता संजय शिरसाट का गुस्सा बीजेपी के स्थानीय नेताओं पर फूट पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि सीट बंटवारे की बातचीत के दौरान बीजेपी का रवैया अपमानजनक था।

शिरसाट ने कड़े शब्दों में कहा:

"हम गठबंधन धर्म निभाना चाहते थे, लेकिन बीजेपी के स्थानीय नेताओं को लगता है कि वे अकेले ही सब कुछ हैं। वे 'दादागिरी' की भाषा बोल रहे हैं। वे हमें वो सीटें देने की बात कर रहे थे जहां हमारी जमानत जब्त हो जाए, और खुद जीतने वाली सीटें रखना चाहते थे। शिवसेना बालासाहेब ठाकरे की पार्टी है, हम किसी की जी-हुजूरी नहीं करेंगे। हम अब सभी 115 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे।"

शिरसाट ने यह भी दावा किया कि बीजेपी ने उनके द्वारा भेजी गई सूची का सम्मान नहीं किया और बातचीत के दरवाजे बंद कर दिए।

BJP का पलटवार: "शिवसेना की मांगें अवास्तविक थीं"

संजय शिरसाट के आरोपों के तुरंत बाद, बीजेपी भी बचाव और हमले की मुद्रा में आ गई। बीजेपी के शहराध्यक्ष शिरीष बोराळकर (Shirish Boralkar) ने मीडिया के सामने आकर गठबंधन टूटने का ठीकरा शिवसेना के सिर फोड़ा।

बोराळकर ने कहा:

"बीजेपी ने हमेशा गठबंधन को बचाने की कोशिश की। लेकिन शिवसेना (शिंदे गुट) उन सीटों की मांग कर रही थी जहां उनका कोई आधार (Base) नहीं है। वे अपनी जमीनी हकीकत से ज्यादा सीटें मांग रहे थे, जो हमारे कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफी होती। अहंकार हममें नहीं, बल्कि उनकी मांगों में था।"

बीजेपी नेताओं का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़ों को देखें तो शहर में बीजेपी का ग्राफ तेजी से ऊपर गया है, इसलिए उन्हें ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए थीं।

सीट शेयरिंग का गणित जो सुलझ नहीं पाया

विवाद की असली जड़ सीटों की संख्या और 'मलाईदार' वॉर्ड थे।

  • कुल सीटें: छत्रपति संभाजीनगर मनपा में लगभग 115 सीटें हैं।

  • शिवसेना की मांग: शिंदे गुट का तर्क था कि औरंगाबाद (संभाजीनगर) उनका पारंपरिक गढ़ है, इसलिए उन्हें 'बड़े भाई' की भूमिका में कम से कम 60-70 सीटें मिलनी चाहिए।

  • बीजेपी की जिद: बीजेपी का कहना था कि पिछले 5 सालों में समीकरण बदल चुके हैं और वे अब शहर में मुख्य ताकत हैं, इसलिए वे 70+ सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते थे।

  • एनसीपी पहले ही अलग: याद रहे कि महायुति का तीसरा घटक, एनसीपी (अजित पवार गुट), पहले ही सम्मानजनक सीटें न मिलने के कारण अकेले लड़ने का ऐलान कर चुका है।

अब क्या होगा? (Impact on Election)

इस फूट के बाद अब छत्रपति संभाजीनगर में मुकाबला चतुष्कोणीय (Four-cornered) या उससे भी ज्यादा पेचीदा हो गया है:

  1. शिवसेना (शिंदे)

  2. बीजेपी

  3. महा विकास अघाड़ी (शिवसेना UBT + कांग्रेस + NCP शरद पवार)

  4. एआईएमआईएम (AIMIM)

  5. एनसीपी (अजित पवार)

विपक्ष की बल्ले-बल्ले

महायुति में पड़ी इस दरार से सबसे ज्यादा खुश विपक्षी खेमा है।

  • शिवसेना (UBT): अंबादास दानवे और चंद्रकांत खैरे जैसे नेताओं के लिए यह एक सुनहरा मौका है। जब शिंदे गुट और बीजेपी के वोट बंटेंगे, तो उसका सीधा फायदा उद्धव ठाकरे की शिवसेना को मिल सकता है।

  • AIMIM: इम्तियाज जलील की पार्टी भी इस बिखराव का फायदा उठाकर अपनी सीटों की संख्या बढ़ा सकती है, खासकर मुस्लिम बहुल और दलित इलाकों में।

क्या यह 'फ्रेंडली फाइट' है या असली जंग?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह अलगाव सिर्फ स्थानीय स्तर पर है और इसका असर राज्य सरकार पर नहीं पड़ेगा। इसे 'फ्रेंडली फाइट' का नाम दिया जा सकता है।

  • दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़कर अपनी असली ताकत (Strength) का अंदाजा लगाना चाहती हैं।

  • चुनाव के बाद, अगर किसी को बहुमत नहीं मिलता है, तो वे फिर से हाथ मिला सकते हैं (Post-poll alliance)।

निष्कर्ष

छत्रपति संभाजीनगर का यह सियासी ड्रामा बताता है कि गठबंधन की राजनीति में स्थानीय महत्वाकांक्षाएं अक्सर राज्य स्तरीय समझौतों पर भारी पड़ जाती हैं। संजय शिरसाट के 'स्वाभिमान' और बीजेपी के 'विस्तारवाद' की इस लड़ाई में अब फैसला जनता की अदालत में होगा। 15 जनवरी 2026 को होने वाले मतदान में पता चलेगा कि असली 'बाजीगर' कौन है—शिंदे की सेना या फडणवीस की बीजेपी?