POCSO Case: बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला; रेप दोषी की सजा 7 साल से बढ़ाकर की 20 साल, कहा- 'नियमों से समझौता नहीं'

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने रेप के दोषी की सजा 7 साल से बढ़ाकर 20 साल कर दी है। कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट के तहत निर्धारित 'न्यूनतम सजा' से कम दंड देना कानूनन गलत है। जानें जस्टिस रजनीश व्यास के फैसले की पूरी जानकारी।

Feb 14, 2026 - 21:39
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POCSO Case: बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला; रेप दोषी की सजा 7 साल से बढ़ाकर की 20 साल, कहा- 'नियमों से समझौता नहीं'
हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार: रेप दोषी की सजा 7 साल से बढ़ाकर सीधे 20 साल की; कहा- "कानून की न्यूनतम सजा से कम देना जज की मर्जी नहीं"

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रेप के दोषी की सजा को तीन गुना बढ़ाते हुए उसे 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। निचली अदालत (Trial Court) ने दोषी को कानून में तय सजा से कम (सिर्फ 7 साल) की सजा दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने "कानूनी भूल" करार दिया और सुधार दिया।

यह फैसला जस्टिस रजनीश आर. व्यास (Justice Rajnish R. Vyas) की पीठ ने 6 फरवरी 2026 को सुनाया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला नांदेड़ का है, जहां एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ था।

  • निचली अदालत का फैसला: 20 जून 2024 को नांदेड़ की विशेष POCSO अदालत ने आरोपी को दोषी तो माना, लेकिन उसे केवल 7 साल की सजा सुनाई।

  • अपील: इस फैसले के खिलाफ दो अपीलें दायर हुईं—एक दोषी द्वारा (सजा कम करने के लिए) और दूसरी पीड़िता द्वारा (सजा बढ़ाने के लिए)।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस व्यास ने कहा कि निचली अदालत ने दोषी ठहराने में तो सही फैसला लिया, लेकिन सजा सुनाने में बड़ी गलती कर दी।

  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट की धारा 6 (गंभीर यौन हमला) के तहत दोषी पाए जाने पर कम से कम 20 साल की सजा का प्रावधान है।

  • कानून जजों को यह अधिकार (Discretion) नहीं देता कि वे इस न्यूनतम सीमा से कम सजा सुनाएं।

जस्टिस व्यास ने टिप्पणी की:

"सजा की अवधि में यह बढ़ोतरी केवल कानून का पालन है। चूंकि कानून में कम से कम 20 साल की सजा तय है, इसलिए अदालत इससे कम सजा नहीं दे सकती। इसे सजा बढ़ाना नहीं, बल्कि कानून को सही तरीके से लागू करना कहा जाएगा।"

कानूनी पेंच: CrPC की धारा 386

हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 386 के तहत अपनी अपीलीय शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सजा में बदलाव किया।

  • Section 42 POCSO Act: कोर्ट ने POCSO एक्ट की धारा 42 का भी हवाला दिया, जो कहती है कि अगर कोई अपराध IPC और POCSO दोनों के तहत आता है, तो दोषी को वह सजा मिलेगी जो ज्यादा सख्त हो। इस मामले में IPC की धारा 376(2)(n) के तहत 10 साल और POCSO के तहत 20 साल की सजा थी, इसलिए 20 साल की सजा लागू की गई।

फैसले का असर

हाईकोर्ट ने दोषी की अपील खारिज कर दी और पीड़िता की अपील स्वीकार करते हुए सजा को 7 साल से बदलकर 20 साल कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने अपहरण (Kidnapping) के आरोपों से बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

निष्कर्ष: यह फैसला उन निचली अदालतों के लिए एक सबक है जो गंभीर अपराधों में भी नरम रुख अपनाती हैं। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि बच्चों के खिलाफ अपराधों में कानून द्वारा तय की गई 'लक्ष्मण रेखा' (Minimum Sentence) को पार करने या उससे समझौता करने का अधिकार किसी को नहीं है।