Mamata vs EC: सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं ममता बनर्जी, चुनाव आयोग को बताया 'व्हाट्सएप कमीशन', बंगाल में 'SIR' पर संग्राम; जानें कोर्ट में क्या हुआ

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) को लेकर ममता बनर्जी और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं। ममता ने सुप्रीम कोर्ट में आयोग पर 58 लाख वोट काटने और भेदभाव का आरोप लगाया। CJI ने माइक्रो-ऑब्जर्वर्स पर नोटिस जारी किया। पढ़ें 4 फरवरी की सुनवाई का पूरा हाल।

Feb 4, 2026 - 18:18
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Mamata vs EC: सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं ममता बनर्जी, चुनाव आयोग को बताया 'व्हाट्सएप कमीशन', बंगाल में 'SIR' पर संग्राम; जानें कोर्ट में क्या हुआ

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों (West Bengal Assembly Elections 2026) की आहट के साथ ही राजनीतिक और कानूनी लड़ाई दिल्ली तक पहुंच गई है। बुधवार (4 फरवरी 2026) को सुप्रीम कोर्ट में एक ऐतिहासिक नजारा देखने को मिला जब किसी राज्य की मुख्यमंत्री—ममता बनर्जी (Mamata Banerjee)—स्वयं वकील की तरह कोर्ट रूम में जिरह करने उतरीं। मामला चुनाव आयोग (ECI) द्वारा बंगाल में चलाए जा रहे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) का है, जिसे लेकर ममता सरकार ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग "विपक्ष शासित राज्यों को निशाना" बना रहा है और लाखों वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटा रहा है। उन्होंने भरी अदालत में चुनाव आयोग को "व्हाट्सएप कमीशन" (WhatsApp Commission) तक कह डाला।

क्या है 'SIR' (Special Intensive Revision)?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर यह लड़ाई किस बात पर है।

  • SIR का मतलब: 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) चुनाव आयोग द्वारा चलाया जाने वाला एक विशेष अभियान है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची (Voter List) को शुद्ध करना है। इसमें नए नाम जोड़ना, मृतकों के नाम हटाना और दोहरे नामों (Duplication) को ठीक करना शामिल है।

  • विवाद की जड़: ममता बनर्जी का आरोप है कि 'शुद्धिकरण' के नाम पर आयोग ने बंगाल में लगभग 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए हैं या उन्हें संदिग्ध श्रेणी में डाल दिया है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया 2026 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को नुकसान पहुंचाने के लिए की जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? (4 फरवरी की सुनवाई के मुख्य बिंदु)

बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत (Surya Kant) की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। ममता बनर्जी ने व्यक्तिगत रूप से पेश होकर अपनी दलीलें रखीं।

1. "सिर्फ बंगाल को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?" ममता बनर्जी ने कोर्ट से भावुक अपील करते हुए कहा, "माय लॉर्ड्स, मैं यहां एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि एक पीड़ित नागरिक के तौर पर आई हूं। सिर्फ बंगाल में ही माइक्रो-ऑब्जर्वर्स (Micro-observers) क्यों नियुक्त किए गए हैं? असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में यह प्रक्रिया क्यों नहीं हो रही? क्या हमें विपक्ष में होने की सजा मिल रही है?"

2. "व्हाट्सएप कमीशन" का तंज ममता ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब आधिकारिक आदेशों के बजाय "व्हाट्सएप" पर निर्देश दे रहा है। उन्होंने कहा, "यह चुनाव आयोग नहीं, व्हाट्सएप कमीशन बन गया है। वे मनमाने ढंग से नियम बदल रहे हैं और हमारे अधिकारियों को दरकिनार कर रहे हैं।"

3. CJI की टिप्पणी: "टैगोर तो टैगोर ही रहेंगे..." सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प पल तब आया जब नामों में स्पेलिंग की गलतियों (Spelling Mismatch) पर बात हुई। ममता ने कहा कि सरनेम की स्पेलिंग (जैसे Roy vs Ray) में मामूली अंतर के कारण लोगों के नाम काटे जा रहे हैं। इस पर CJI सूर्य कांत ने टिप्पणी की:

"टैगोर (Tagore) तो टैगोर ही रहेंगे, चाहे आप उनकी स्पेलिंग कैसे भी लिखें। नाम की वर्तनी में गलती होने से किसी नागरिक का मताधिकार नहीं छीना जा सकता। चुनाव आयोग को इसे सुधारना होगा।"

4. माइक्रो-ऑब्जर्वर्स पर नोटिस जारी ममता बनर्जी ने आयोग द्वारा बंगाल में 8,100 बाहरी 'माइक्रो-ऑब्जर्वर' नियुक्त करने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि ये पर्यवेक्षक स्थानीय अधिकारियों के काम में दखल दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और पूछा कि सिर्फ बंगाल में ही ये नियुक्तियां क्यों की गईं।

आधार कार्ड और 'लॉजिकल विसंगति' (Logical Discrepancy)

ममता बनर्जी ने कोर्ट को बताया कि आयोग 'लॉजिकल विसंगति' (Logical Discrepancy) के नाम पर लाखों लोगों को परेशान कर रहा है।

  • उदाहरण के लिए, अगर किसी परिवार में माता-पिता और बच्चे की उम्र में अंतर कम दिखता है, या शादी के बाद बेटी का सरनेम बदल गया है, तो उन्हें नोटिस भेजे जा रहे हैं।

  • ममता ने कहा, "गरीब लोग, जो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, वे अपनी नागरिकता साबित करने के लिए बार-बार दफ्तरों के चक्कर कैसे काटेंगे? आधार कार्ड होने के बावजूद उनसे अन्य दस्तावेज मांगे जा रहे हैं।"

  • इस पर CJI ने कहा कि आधार कार्ड की भी अपनी सीमाएं हैं, लेकिन प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार (9 फरवरी 2026) के लिए तय की है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी भी वैध मतदाता का नाम नहीं कटना चाहिए और चुनाव आयोग को पारदर्शिता बरतनी होगी।

निष्कर्ष

ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट में पेश होना यह दर्शाता है कि 2026 का बंगाल चुनाव कितना महत्वपूर्ण है। यह लड़ाई अब सिर्फ राजनीतिक रैलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता सूची के एक-एक पन्ने पर लड़ी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट SIR प्रक्रिया पर रोक लगाता है या इसमें बदलाव करता है, तो यह ममता बनर्जी के लिए बड़ी जीत होगी। वहीं, चुनाव आयोग के लिए अपनी निष्पक्षता साबित करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।