Sambhajinagar Civic Polls: महायुति में 'सीट शेयरिंग' पर घमासान! शिवसेना के गढ़ में BJP के दावों से बढ़ी बेचैनी
छत्रपति संभाजीनगर महानगरपालिका चुनाव से पहले शिवसेना (शिंदे गुट) और बीजेपी के बीच सीटों को लेकर तनाव बढ़ गया है। बीजेपी की आक्रामक रणनीति और ज्यादा सीटों की मांग ने सेना के खेमे में असंतोष पैदा कर दिया है। जानें क्या है महायुति का अंदरूनी समीकरण।
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): महाराष्ट्र की राजनीति में मराठवाड़ा का केंद्र माने जाने वाले छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) में महानगरपालिका चुनावों (Municipal Polls) की आहट के साथ ही सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। लेकिन इस बार लड़ाई विपक्ष से ज्यादा सत्ताधारी गठबंधन 'महायुति' (Mahayuti) के भीतर ही देखने को मिल रही है।
ताजा राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, आगामी मनपा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की आक्रामक विस्तार नीति ने उनके सहयोगी दल शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) की नींद उड़ा दी है। शहर, जिसे दशकों से शिवसेना का "अभेद्य किला" माना जाता रहा है, वहां अब बीजेपी "बड़े भाई" की भूमिका में आने की कोशिश कर रही है, जिससे जमीनी स्तर के शिवसैनिकों में भारी आक्रोश और बेचैनी है।
क्या है विवाद की जड़? (Bone of Contention)
विवाद का मुख्य कारण सीट बंटवारा (Seat Sharing) है।
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शिवसेना का दावा: छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) हमेशा से बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना का गढ़ रहा है। पिछले कई दशकों से मनपा में शिवसेना का दबदबा रहा है। शिंदे गुट का मानना है कि वे असली शिवसेना हैं, इसलिए उन्हें सम्मानजनक और बड़े हिस्से (Major Share) की सीटें मिलनी चाहिए।
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बीजेपी की रणनीति: दूसरी तरफ, बीजेपी का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में, शहर में उनका वोट बैंक तेजी से बढ़ा है। बीजेपी "विस्तारवादी नीति" के तहत इस बार मनपा में ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है।
शिवसेना खेमे में बढ़ती बेचैनी
रिपोर्ट्स के अनुसार, बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने मनपा की उन सीटों पर भी दावा ठोक दिया है जो पारंपरिक रूप से शिवसेना के पास रही हैं। बीजेपी की दलील है कि बदलती डेमोग्राफी और शहरी विकास के मुद्दों पर उनका प्रभाव ज्यादा है।
इस "दबाव की राजनीति" ने शिंदे गुट के स्थानीय नेताओं और पूर्व नगरसेवकों को डरा दिया है।
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टिकट कटने का डर: कई मौजूदा और पूर्व शिवसैनिकों को डर है कि गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में उनकी सीट बीजेपी के खाते में जा सकती है।
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अस्तित्व की लड़ाई: शिवसेना के पुराने वफादारों का कहना है कि अगर अपने ही गढ़ में बीजेपी को ज्यादा सीटें दी गईं, तो शहर में शिवसेना का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। एक स्थानीय नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "हम गठबंधन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर समझौता नहीं होगा।"
बीजेपी का 'मिशन संभाजीनगर'
बीजेपी के लिए छत्रपति संभाजीनगर मनपा जीतना सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि एक 'मिशन' है।
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पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व मराठवाड़ा में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।
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बीजेपी का मानना है कि 'हिंदुत्व' और 'विकास' के एजेंडे पर वे अकेले दम पर भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं, इसलिए वे शिंदे गुट पर निर्भर रहने के बजाय अपनी ताकत आजमाना चाहते हैं।
विपक्ष (MVA) की नजर
महायुति के भीतर मची इस खींचतान का सीधा फायदा विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (MVA) को मिल सकता है।
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उद्धव गुट (UBT) का मौका: शिवसेना (UBT) इस असंतोष को भुनाने की ताक में है। अगर शिंदे गुट के नाराज नेता बगावत करते हैं, तो वे उद्धव ठाकरे की ओर वापस लौट सकते हैं, जिससे "मराठी मानुस" और "कट्टर शिवसैनिक" का वोट बैंक शिफ्ट हो सकता है।
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MIM का फैक्टर: एआईएमआईएम (AIMIM) भी इस फूट का फायदा उठाकर मुस्लिम बहुल और दलित वॉर्डों में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है।
हाईकमान के पाले में गेंद
फिलहाल, स्थानीय स्तर पर दोनों पार्टियों के बीच बैठकों का दौर जारी है, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। मामला अब मुंबई स्थित हाईकमान के पास जाने की संभावना है।
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देवेन्द्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे को जल्द ही इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करना होगा।
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चुनौती यह है कि अगर बीजेपी ज्यादा दबाव बनाती है, तो गठबंधन में "भीतरघात" (Sabotage) का खतरा बढ़ जाएगा, और अगर शिवसेना को ज्यादा सीटें मिलती हैं, तो बीजेपी का स्थानीय कैडर नाराज हो सकता है।
निष्कर्ष
छत्रपति संभाजीनगर मनपा चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति का 'लिटमस टेस्ट' साबित होंगे। यह चुनाव तय करेगा कि क्या शिंदे गुट बीजेपी के साथ बराबरी का साझीदार बनकर रह सकता है, या फिर उसे धीरे-धीरे "छोटे भाई" की भूमिका स्वीकार करनी पड़ेगी। फिलहाल, शहर में गठबंधन की गांठे ढीली होती नजर आ रही हैं।