Supreme Court PIL: नॉर्थ-ईस्ट के लोगों पर नस्लीय हमलों के खिलाफ SC में याचिका, सख्त कानून और सुरक्षा की मांग
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर पूर्वोत्तर भारत के नागरिकों के खिलाफ बढ़ रही नस्लीय हिंसा (Racial Violence) पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में बेज़बरुआ कमेटी की सिफारिशों को लागू करने और 'हेट स्पीच' के खिलाफ सख्त कार्रवाई की अपील की गई है। जानें पूरा मामला।
नई दिल्ली: भारत विविधता का देश है, लेकिन इसी देश के एक अभिन्न अंग—पूर्वोत्तर भारत (Northeast India)—के नागरिकों को अक्सर देश के अन्य हिस्सों में नस्लीय भेदभाव और हिंसा का शिकार होना पड़ता है। "चिंकी", "चीनी" या "मोमो" जैसे अपमानजनक शब्दों से लेकर शारीरिक हमलों तक, यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर अब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के दरवाजे पर पहुंच गया है।
सोमवार (30 दिसंबर) को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ हो रही नस्लीय हिंसा को रोकने के लिए तत्काल और सख्त कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिका में क्या कहा गया है? (The Key Demands)
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह पीआईएल दायर की है, जो नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है। याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दों पर जोर दिया गया है:
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नस्लीय हिंसा पर 'जीरो टॉलरेंस': याचिका में कहा गया है कि दिल्ली-एनसीआर और अन्य मेट्रो शहरों में पूर्वोत्तर के छात्रों और पेशेवरों को अक्सर उनकी शारीरिक बनावट के कारण निशाना बनाया जाता है। इसे रोकने के लिए एक 'जीरो टॉलरेंस' नीति अपनाई जानी चाहिए।
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बेज़बरुआ कमेटी (Bezbaruah Committee) की सिफारिशें: 2014 में निडो तानिया (Nido Tania) हत्याकांड के बाद गठित एम.पी. बेज़बरुआ समिति ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, जिनमें पुलिस सुधार और कानून में बदलाव शामिल थे। याचिका में मांग की गई है कि इन सिफारिशों को पूरी तरह से लागू किया जाए।
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नोडल अधिकारी की नियुक्ति: देश के हर पुलिस थाने में, विशेषकर उन इलाकों में जहां पूर्वोत्तर के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं, एक विशेष नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए जो उनकी शिकायतों को संवेदनशीलता से सुने।
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फास्ट ट्रैक कोर्ट: नस्लीय हमलों से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन हो ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
भेदभाव का दर्द और संवैधानिक अधिकार
याचिका में तर्क दिया गया है कि पूर्वोत्तर के नागरिकों के साथ होने वाला भेदभाव भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि अक्सर पुलिस ऐसे मामलों को साधारण झगड़े (IPC की धारा 323 या 504) के रूप में दर्ज करती है, जबकि ये स्पष्ट रूप से 'हेट क्राइम' (Hate Crime) की श्रेणी में आते हैं। जब किसी व्यक्ति को उसकी नस्ल या क्षेत्र के कारण निशाना बनाया जाता है, तो यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि देश की अखंडता पर हमला है।
इतिहास जो हमें शर्मिंदा करता है (The Context)
यह याचिका निर्वात में नहीं आई है। पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद, पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ हमलों में तेजी देखी गई है।
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निडो तानिया केस (2014): दिल्ली के लाजपत नगर में अरुणाचल प्रदेश के छात्र निडो तानिया की नस्लीय टिप्पणी के बाद हुए झगड़े में हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
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कोविड के दौरान बदसलूकी: महामारी के दौरान पूर्वोत्तर के कई लोगों को "कोरोना फैलाने वाला" कहकर प्रताड़ित किया गया और उन्हें किराए के मकानों से निकाला गया।
इन घटनाओं के बावजूद, जमीन पर स्थिति में बहुत कम सुधार हुआ है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सिर्फ एडवाइजरी जारी करना काफी नहीं है; अब ठोस दंडात्मक कार्रवाई की जरूरत है।
बेज़बरुआ कमेटी ने क्या कहा था?
एम.पी. बेज़बरुआ कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि भारतीय दंड संहिता (IPC) में एक नई धारा जोड़ी जानी चाहिए जो विशेष रूप से नस्लीय टिप्पणियों और कृत्यों को अपराध घोषित करे।
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समिति ने सुझाव दिया था कि "चिंकी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने वालों को जेल की सजा होनी चाहिए।
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इसके अलावा, एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों में पूर्वोत्तर भारत के इतिहास और संस्कृति को विस्तार से शामिल करने की सिफारिश की गई थी ताकि बच्चों को बचपन से ही शिक्षित किया जा सके।
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दुर्भाग्य से, इनमें से अधिकांश सिफारिशें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं या आधे-अधूरे मन से लागू की गई हैं।
जागरूकता की कमी सबसे बड़ी चुनौती
कानूनी लड़ाई के अलावा, यह एक सामाजिक लड़ाई भी है। याचिका में केंद्र सरकार से यह भी मांग की गई है कि वह एक व्यापक जागरूकता अभियान (Awareness Campaign) चलाए।
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स्कूलों और कॉलेजों में संवेदनशीलता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
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पुलिस बलों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाए कि वे अलग संस्कृति और भाषा वाले लोगों के साथ कैसे व्यवहार करें।
सुप्रीम कोर्ट से उम्मीदें
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। अगर कोर्ट इस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी करता है और निगरानी तंत्र स्थापित करने का आदेश देता है, तो यह पूर्वोत्तर के लाखों नागरिकों के लिए एक बड़ी जीत होगी।
यह सिर्फ एक क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के नारे की परीक्षा है। जब तक देश का हर नागरिक, चाहे वह कोहिमा का हो या कोच्चि का, दिल्ली या मुंबई में सुरक्षित महसूस नहीं करता, तब तक हमारा लोकतंत्र अधूरा है।