Iran Crisis: महंगाई और गिरती करेंसी से जल उठा ईरान! प्रदर्शनों में अब तक 7 की मौत, सड़कों पर 'तानाशाह मुर्दाबाद' के नारे; जानें 10 बड़ी बातें
ईरान में रियाल (Currency) के रिकॉर्ड पतन और 50% महंगाई के खिलाफ जनआक्रोश भड़क उठा है। तेहरान से लेकर इस्फ़हान तक हिंसक प्रदर्शन जारी हैं, जिसमें अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान की सरकार बैकफुट पर है। पढ़ें ईरान संकट की 10 बड़ी बातें।
तेहरान (Tehran): साल 2026 की शुरुआत ईरान के लिए बेहद अशांत रही है। पश्चिम एशिया का यह प्रमुख देश एक बार फिर सुलग उठा है। इस बार गुस्सा हिजाब या धार्मिक कानूनों को लेकर नहीं, बल्कि पेट की आग और जेब पर पड़ी मार को लेकर है।
ईरानी मुद्रा 'रियाल' (Rial) के ऐतिहासिक पतन और आसमान छूती महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से शुरू हुआ व्यापारियों का गुस्सा अब देशव्यापी आंदोलन में बदल गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले 5 दिनों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में कम से कम 7 लोगों की मौत हो चुकी है।
टाइम्स ऑफ इंडिया और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यहाँ जानिए ईरान के मौजूदा हालात से जुड़ी 10 बड़ी बातें (10 Things to Know):
1. करेंसी का ऐतिहासिक पतन (Record Currency Collapse)
ईरान की मुद्रा 'रियाल' डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। ओपन मार्केट में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 14.5 लाख रियाल तक पहुंच गई है। इसका मतलब है कि आम ईरानी नागरिक की महीने भर की कमाई की वैल्यू अब कौड़ियों के भाव रह गई है।
2. महंगाई ने तोड़ी कमर (Soaring Inflation)
ईरान में आधिकारिक महंगाई दर 40% से 50% के बीच बताई जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे भी भयानक है। खाने-पीने की चीजों, विशेषकर मांस और सब्जियों के दाम आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गए हैं। पिछले एक साल में खाद्य पदार्थों की कीमतों में 70% तक का इजाफा हुआ है।
3. मौत का आंकड़ा: अब तक 7 की जान गई
शांतिपूर्ण शुरू हुए प्रदर्शन अब हिंसक हो गए हैं। पश्चिमी ईरान के शहरों जैसे लॉर्डेगन (Lordegan) और कुहदश्त (Kouhdasht) में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच गोलीबारी हुई है। मानवाधिकार समूहों और स्थानीय मीडिया के अनुसार, अब तक 7 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जिनमें प्रदर्शनकारी और सुरक्षा बल (Basij) के सदस्य शामिल हैं।
4. बाज़ार बंद, व्यापारी सड़कों पर
आमतौर पर सरकार के समर्थक माने जाने वाले 'बाज़ारी' (व्यापारी वर्ग) ने इस बार विद्रोह का बिगुल फूंका है। तेहरान, शिराज़ और इस्फ़हान के प्रमुख बाज़ार बंद हैं। व्यापारियों का कहना है कि डॉलर के रेट में इतनी अस्थिरता है कि वे न तो माल खरीद पा रहे हैं और न ही बेच पा रहे हैं।
5. "तानाशाह मुर्दाबाद" के नारे
शुरुआत में आर्थिक मांगों तक सीमित यह आंदोलन अब राजनीतिक रूप ले चुका है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोग "तानाशाह मुर्दाबाद" (Death to the Dictator) और "खामेनेई को शर्म आनी चाहिए" जैसे नारे लगाते दिख रहे हैं। यह सीधे तौर पर सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को चुनौती है।
6. सेंट्रल बैंक चीफ की छुट्टी
जनता के गुस्से को ठंडा करने के लिए सरकार ने बलि का बकरा ढूंढ लिया है। ईरान के सेंट्रल बैंक के गवर्नर मोहम्मद रज़ा फरज़ीन को उनके पद से हटा दिया गया है और उनकी जगह पूर्व वित्त मंत्री अब्दोलनासर हेम्मती को कमान सौंपी गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चेहरे बदलने से अर्थव्यवस्था नहीं सुधरेगी।
7. सरकार का अजीबोगरीब कदम: 'छुट्टी' घोषित
प्रदर्शनों को फैलने से रोकने के लिए सरकार ने एक अजीब तरीका अपनाया। अधिकारियों ने अचानक "ठंड और प्रदूषण" का हवाला देते हुए देश के कई हिस्सों में सरकारी छुट्टी और बाज़ार बंद रखने का आदेश दे दिया। इसे जनता को घरों में कैद रखने की चाल माना जा रहा है।
8. राष्ट्रपति की लाचारी
सुधारवादी माने जाने वाले राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान (Masoud Pezeshkian) ने स्वीकार किया है कि लोगों की मांगें जायज हैं। उन्होंने कहा, "अगर हम लोगों की रोजी-रोटी का मसला हल नहीं कर पाए, तो हम जहन्नुम में जाएंगे।" हालांकि, उनके पास भी सीमित विकल्प हैं क्योंकि असली ताकत सुप्रीम लीडर और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के पास है।
9. प्रतिबंध और युद्ध का साया
ईरान की इस हालत के पीछे अमेरिकी प्रतिबंध और इजरायल के साथ चल रहा तनाव भी एक बड़ी वजह है। 2025 में हुए संघर्षों और परमाणु कार्यक्रम पर लगे प्रतिबंधों ने ईरान के तेल निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे देश में विदेशी मुद्रा (Foreign Currency) की भारी किल्लत हो गई है।
10. 2022 से भी बड़ा खतरा?
विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन 2022 के 'महसा अमीनी' (Mahsa Amini) विरोध प्रदर्शनों से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। 2022 में मुद्दा सामाजिक आजादी का था, लेकिन इस बार मुद्दा 'भूख' का है, जो समाज के हर वर्ग—गरीब, मजदूर और व्यापारी—को एक साथ सड़क पर ले आया है।
निष्कर्ष
ईरान एक बार फिर दोराहे पर खड़ा है। सरकार ने अगर जल्द ही अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए और दमनकारी नीति जारी रखी, तो यह चिंगारी एक बड़ी क्रांति में बदल सकती है। फिलहाल, तेहरान की सड़कों पर सन्नाटा है, लेकिन यह तूफान से पहले की शांति भी हो सकती है।