Trump Doctrine 2.0: 'चाइना फर्स्ट' की दुनिया में अमेरिका के लिए भारत क्यों है खास? जानें ट्रंप की नई रणनीति
डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति में भारत कहाँ खड़ा है? चीन को रोकने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत है, लेकिन टैरिफ और ट्रेड पर पेंच फंस सकता है। पढ़ें 'ट्रंप डॉक्ट्रिन' और भारत-अमेरिका रिश्तों का पूरा विश्लेषण।
वाशिंगटन/नई दिल्ली: डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी सिर्फ अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की भू-राजनीति (Geopolitics) के लिए एक बड़ा बदलाव है। ट्रंप की विदेश नीति, जिसे अक्सर "ट्रंप डॉक्ट्रिन" (The Trump Doctrine) कहा जाता है, बहुत सीधी और स्पष्ट है— "अमेरिका फर्स्ट" (America First)।
लेकिन 2025 में दुनिया बदल चुकी है। आज अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती रूस या आतंकवाद नहीं, बल्कि चीन (China) है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की नई रणनीति में दुनिया को "चाइना-फर्स्ट" नजरिए से देखा जा रहा है। इसका मतलब है कि अमेरिका हर फैसला इस आधार पर लेगा कि उससे चीन को कैसे रोका जा सकता है।
इस बड़े खेल में भारत (India) की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। आइए समझते हैं कि ट्रंप 2.0 के दौर में अमेरिका भारत को कैसे देखता है और नई दिल्ली के लिए इसके क्या मायने हैं।
1. चीन का डर और भारत की दोस्ती (The China Factor)
ट्रंप की विदेश नीति का सबसे बड़ा स्तंभ चीन का मुकाबला करना है। रिपब्लिकन पार्टी और ट्रंप के सलाहकार मानते हैं कि चीन अमेरिका के वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
-
दुश्मन का दुश्मन, दोस्त: इस समीकरण में भारत अमेरिका के लिए सबसे स्वाभाविक साझीदार (Natural Partner) है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और एशिया में वर्चस्व की लड़ाई जगजाहिर है।
-
काउंटर-बैलेंस: ट्रंप प्रशासन चाहता है कि एशिया में भारत इतना मजबूत हो कि वह चीन को टक्कर दे सके। इसलिए, रक्षा समझौतों और हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में सहयोग बढ़ने की पूरी उम्मीद है।
-
क्वाड (QUAD): ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में 'क्वाड' (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) को पुनर्जीवित किया था। अब वे इसे चीन के खिलाफ एक मजबूत सैन्य और रणनीतिक गठबंधन के रूप में इस्तेमाल करना चाहेंगे।
2. "दोस्ती अपनी जगह, धंधा अपनी जगह" (Transactional Relationship)
ट्रंप और पीएम मोदी की निजी केमिस्ट्री (Chemistry) शानदार है। "हाउडी मोदी" और "नमस्ते ट्रंप" जैसे इवेंट्स इसकी गवाही देते हैं। लेकिन, ट्रंप एक बिजनेसमैन हैं और उनकी कूटनीति पूरी तरह से लेन-देन (Transactional) पर आधारित है।
-
टैरिफ किंग (Tariff King): ट्रंप कई बार भारत को "टैरिफ किंग" कह चुके हैं। उनका मानना है कि भारत अमेरिकी सामानों पर बहुत ज्यादा टैक्स लगाता है।
-
रेसिप्रोकल टैक्स (Reciprocal Tax): ट्रंप डॉक्ट्रिन के तहत, अगर भारत अमेरिकी हार्ले डेविडसन बाइक या एप्पल उत्पादों पर टैक्स कम नहीं करता, तो अमेरिका भी भारतीय आईटी सेवाओं (IT Services) या फार्मा उत्पादों पर टैक्स बढ़ा सकता है।
-
निष्कर्ष: रणनीतिक रूप से अमेरिका भारत के साथ खड़ा रहेगा, लेकिन व्यापार (Trade) के मामले में वह भारत पर दबाव डालने से पीछे नहीं हटेगा।
3. लोकतंत्र और मानवाधिकार पर चुप्पी (Silence on Human Rights)
बाइडेन प्रशासन के दौरान भारत को अक्सर मानवाधिकारों, प्रेस की आजादी या अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर अमेरिकी बयानों का सामना करना पड़ता था। "ट्रंप डॉक्ट्रिन" में इसे प्राथमिकता नहीं दी जाती।
-
हस्तक्षेप नहीं: ट्रंप दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल देने में विश्वास नहीं रखते, जब तक कि वह अमेरिका के हितों को सीधे प्रभावित न करे।
-
भारत के लिए राहत: यह मोदी सरकार के लिए राहत की बात हो सकती है। ट्रंप प्रशासन का फोकस "वैल्यूज" (Values) के बजाय "इंटरेस्ट" (Interests) पर होगा। यानी, "आप अपने देश में क्या करते हैं, उससे हमें मतलब नहीं, बस चीन के खिलाफ हमारे साथ खड़े रहो।"
4. इमिग्रेशन और H-1B वीजा का पेंच
भारतीय पेशेवरों के लिए ट्रंप की वापसी थोड़ी चिंताजनक हो सकती है। ट्रंप की नीति "हायर अमेरिकन" (Hire American) की है।
-
हालांकि, ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि वह अमेरिकी कॉलेजों से ग्रेजुएट होने वाले विदेशी छात्रों को ग्रीन कार्ड देने के पक्ष में हैं, लेकिन उनकी पार्टी का एक बड़ा धड़ा सख्त इमिग्रेशन नियमों की वकालत करता है।
-
अगर ट्रंप प्रशासन H-1B वीजा के नियमों को सख्त करता है, तो इसका सीधा असर भारतीय आईटी कंपनियों और पेशेवरों पर पड़ेगा।
5. रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की स्थिति
ट्रंप का वादा है कि वे आते ही रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवा देंगे। यह भारत के लिए अच्छी खबर है।
-
बाइडेन प्रशासन भारत पर रूस से तेल न खरीदने और पुतिन से दूरी बनाने का दबाव डालता रहा है।
-
ट्रंप का पुतिन के साथ भी ठीक-ठाक रिश्ता है। ऐसे में, भारत को रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने (Balancing Act) की जो मशक्कत करनी पड़ रही थी, वह ट्रंप के दौर में कम हो सकती है।
निष्कर्ष: भारत के लिए आगे की राह
कुल मिलाकर, "ट्रंप डॉक्ट्रिन" भारत के लिए अवसरों और चुनौतियों का मिला-जुला पैकेट है।
-
अवसर: चीन के खिलाफ एक मजबूत अमेरिकी साथी मिलेगा, रक्षा तकनीक मिलेगी, और मानवाधिकारों पर लेक्चर नहीं सुनना पड़ेगा।
-
चुनौती: व्यापार युद्ध (Trade War) और वीजा नियमों में सख्ती का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिका की नजर में भारत अब कोई "छोटा भाई" नहीं, बल्कि एक "जरूरी पार्टनर" है। चीन को रोकने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत है, और अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए भारत को अमेरिका की। यही वह धुरी है जिस पर अगले चार साल तक दुनिया की राजनीति घूमेगी।