Aurangabad GMCH Crisis: 4 महीने से वेतन नहीं! हड़ताल पर गए कर्मचारी, घाटी अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के सरकारी अस्पताल में अनुबंधित कर्मचारियों ने 4 महीने से वेतन न मिलने पर काम बंद कर दिया है। हड़ताल के कारण मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जानें क्या है कर्मचारियों की मांग और प्रशासन का जवाब।

Feb 5, 2026 - 18:26
 0
Aurangabad GMCH Crisis: 4 महीने से वेतन नहीं! हड़ताल पर गए कर्मचारी, घाटी अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं
छत्रपति संभाजीनगर: "पेट में अन्न नहीं तो काम कैसे करें?" 4 महीने से वेतन न मिलने पर हड़ताल पर गए कर्मचारी, घाटी अस्पताल में मरीज बेहाल

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): मराठवाड़ा की राजधानी छत्रपति संभाजीनगर में स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले अनुबंधित कर्मचारियों (Contract Staff) के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया है। शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज (GMCH/घाटी अस्पताल) में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों ने पिछले 4 महीनों से वेतन न मिलने के विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल (Strike) शुरू कर दी है।

गुरुवार को अस्पताल परिसर में "वेतन दो या काम लो" के नारों के साथ कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस हड़ताल का सीधा और गंभीर असर मरीजों की देखभाल और अस्पताल की साफ-सफाई पर पड़ा है, जिससे प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं।

क्या है पूरा मामला? (The Core Issue)

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अस्पताल में सुरक्षा गार्ड, वार्ड बॉय, सफाई कर्मचारी और डेटा एंट्री ऑपरेटर के तौर पर काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारी एक निजी एजेंसी (Contractor) के माध्यम से नियुक्त हैं।

  • 4 महीने का बकाया: इन कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें पिछले 4 महीनों से एक रुपया भी वेतन नहीं मिला है।

  • त्योहार भी फीके: कर्मचारियों का कहना है कि वेतन न मिलने के कारण उनके घर का चूल्हा जलना मुश्किल हो गया है। दिवाली और संक्रांति जैसे त्योहार भी उन्होंने उधारी मांगकर मनाए, लेकिन अब स्थिति बर्दाश्त के बाहर हो गई है।

हड़ताल का असर: मरीजों की जान पर बनी (Impact on Patients)

कर्मचारियों के काम बंद करने से अस्पताल की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।

  1. साफ-सफाई ठप: सफाई कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने से वॉर्डों और गलियारों में कचरे के ढेर लगने शुरू हो गए हैं। इससे अस्पताल में संक्रमण (Infection) फैलने का खतरा बढ़ गया है।

  2. मरीजों को परेशानी: वार्ड बॉय की अनुपस्थिति में मरीजों को स्ट्रेचर (Stretcher) पर ले जाने वाला कोई नहीं है। कई बुजुर्ग और गंभीर मरीजों के परिजनों को खुद ही स्ट्रेचर धक्का लगाते हुए देखा गया।

  3. ओपीडी और पर्चा काउंटर: डेटा एंट्री ऑपरेटर्स के काम बंद करने से ओपीडी (OPD) के बाहर मरीजों की लंबी कतारें लग गई हैं और पर्चा बनने में घंटों लग रहे हैं।

कर्मचारियों का दर्द: "मकान मालिक घर से निकाल रहे हैं"

प्रदर्शन कर रहे एक कर्मचारी ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा:

"हम दिन-रात मरीजों की सेवा करते हैं, कोरोना काल में भी हमने अपनी जान की परवाह नहीं की। लेकिन बदले में हमें क्या मिल रहा है? 4 महीने से वेतन नहीं मिला है। मकान मालिक किराया मांग रहे हैं, बच्चों की स्कूल फीस नहीं भरी गई है, और दुकानदार अब उधार देने से मना कर रहे हैं। प्रशासन हमें भूखा मारकर काम करवाना चाहता है।"

कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि ठेकेदार और प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं। जब भी वे वेतन मांगते हैं, उन्हें "अगले हफ्ते मिलेगा" कहकर टाल दिया जाता है।

प्रशासन की प्रतिक्रिया

हड़ताल के तूल पकड़ते ही अस्पताल प्रशासन हरकत में आया है। डीन (Dean) और वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रदर्शनकारी कर्मचारियों से बातचीत की कोशिश की है।

  • प्रशासन का तर्क है कि सरकार की ओर से फंड (Grants) जारी होने में देरी हुई है, जिसके कारण वेतन रुका हुआ है।

  • अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि ठेकेदार एजेंसी पर दबाव बनाकर जल्द से जल्द कम से कम एक या दो महीने का वेतन जारी करवाया जाएगा।

  • हालांकि, कर्मचारी इस बार केवल आश्वासन मानने को तैयार नहीं हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि जब तक बैंक खाते में पैसे नहीं आते, वे काम पर नहीं लौटेंगे।

वैकल्पिक व्यवस्था की कोशिश

हड़ताल के कारण आपातकालीन सेवाओं (Emergency Services) पर असर न पड़े, इसके लिए प्रशासन ने रेजिडेंट डॉक्टर्स और नर्सिंग छात्रों की मदद लेने का फैसला किया है। लेकिन सफाई और सुरक्षा जैसे कार्यों के लिए कोई विकल्प नहीं होने से स्थिति बिगड़ती जा रही है।

निष्कर्ष

छत्रपति संभाजीनगर का घाटी अस्पताल पूरे मराठवाड़ा क्षेत्र के मरीजों के लिए एकमात्र सहारा है। ऐसे में कर्मचारियों की यह हड़ताल सीधे तौर पर गरीब मरीजों के जीवन से खिलवाड़ है। सवाल यह उठता है कि आखिर प्रशासन 4 महीने तक सोया क्यों रहा? क्या सिस्टम को तभी होश आता है जब कर्मचारी सड़कों पर उतरते हैं और मरीज तड़पते हैं? फिलहाल, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह गतिरोध कब खत्म होगा।