Aurangabad ZP News: फंड की कमी से अटका 'सपनों का महल'! 10.4 करोड़ नहीं मिले, पुरानी इमारत में बैठेंगे नए जिला परिषद सदस्य

छत्रपति संभाजीनगर जिला परिषद की नई 'ग्रीन बिल्डिंग' का काम फंड की कमी (₹10.4 करोड़) के कारण अटक गया है। 7 फरवरी के चुनाव के बाद आने वाली नई बॉडी को पुरानी इमारत से ही काम चलाना पड़ेगा। जानें सीईओ अंकित का क्या है प्लान।

Feb 6, 2026 - 19:55
Feb 6, 2026 - 20:01
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Aurangabad ZP News: फंड की कमी से अटका 'सपनों का महल'! 10.4 करोड़ नहीं मिले, पुरानी इमारत में बैठेंगे नए जिला परिषद सदस्य
फंड के अभाव में अधूरी रह गई जिला परिषद की नई इमारत: 10.4 करोड़ रुपये की मंजूरी अटकी, पुरानी बिल्डिंग में ही शपथ लेंगे नए सदस्य

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): छत्रपति संभाजीनगर जिला परिषद (ZP) के नवनिर्वाचित सदस्यों का आधुनिक और हाईटेक ऑफिस में बैठने का सपना फिलहाल अधूरा रह गया है। 7 फरवरी को होने वाले मतदान और 9 फरवरी को आने वाले नतीजों के बाद जो नई बॉडी (पदाधिकारी) चुनकर आएगी, उसे अपनी सरकार पुरानी इमारत से ही चलानी होगी।

वजह है—फंड की कमी। रिपोर्ट के मुताबिक, जिला परिषद की नई निर्माणाधीन 'ग्रीन बिल्डिंग' (Green Building) का ढांचा तो तैयार है, लेकिन उसके अंदर फर्नीचर और अन्य सुविधाओं के लिए जरूरी 10.4 करोड़ रुपये की फाइल मंत्रालय में धूल फांक रही है।

क्यों अटका काम? (The Roadblock)

जिला परिषद प्रशासन ने जुलाई 2025 में ही राज्य सरकार को फर्नीचर, फायर सेफ्टी और बिजली व्यवस्था के लिए 10.4 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा था।

  • देरी: 7 महीने बीत जाने के बाद भी इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली है।

  • अधिकारियों का बयान: वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अगर आज पैसा मिल भी जाए, तो भी फर्नीचर का काम पूरा होने में कम से कम 6 महीने लगेंगे। इसका मतलब साफ है कि नई बॉडी को अपना कार्यकाल पुरानी इमारत से ही शुरू करना होगा।

बजट का गणित और लेटलतीफी

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत से ही अड़चनें आ रही हैं।

  1. लागत बढ़ी: 2021 में जब यह प्रोजेक्ट पास हुआ था, तब इसकी लागत 47.3 करोड़ रुपये थी। लेकिन जगह बदलने, मिट्टी की जांच और विभागों की संख्या (12 से 17) बढ़ाने के कारण लागत बढ़कर 97.4 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

  2. सरकार की मंजूरी: सितंबर 2024 में सरकार ने 59.4 करोड़ रुपये की संशोधित मंजूरी दी, लेकिन इसमें फर्नीचर और सोलर सिस्टम का पैसा शामिल नहीं था। अब तक मिले 51 करोड़ रुपये पूरी तरह खर्च हो चुके हैं।

अब क्या होगा? (CEO का प्लान बी)

जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अंकित (Ankit) ने स्थिति को संभालते हुए वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी कर ली है।

  • पुरानी इमारत का सहारा: सीईओ ने बताया कि जनरल बॉडी (GB) की बैठकें पुरानी इमारत के हॉल में ही आयोजित की जाएंगी, जहां लगभग 110 सदस्यों के बैठने की जगह है।

  • सेस फंड का उपयोग: अगर सरकार से पैसा आने में और देरी होती है, तो जिला परिषद अपने 'सेस फंड' (Cess Funds) में पड़े 7 करोड़ रुपयों का इस्तेमाल करके नई इमारत के मुख्य हॉल को तैयार करने पर विचार कर सकती है।

निष्कर्ष

यह विडंबना ही है कि करोड़ों की लागत से बनी एक शानदार इमारत केवल कुर्सियों और मेजों (फर्नीचर) के अभाव में खाली पड़ी रहेगी। नवनिर्वाचित अध्यक्ष और सभापतियों को अब अपनी "नई पारी" की शुरुआत "पुरानी पिच" पर ही करनी होगी।