Maharashtra Pension News: सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत! अब पेंशन के लिए 'नो-ड्यूज' सर्टिफिकेट का झंझट खत्म, देरी करने वाले अफसरों पर होगी कार्रवाई
महाराष्ट्र सरकार का ऐतिहासिक फैसला। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अब पेंशन और ग्रेच्युटी के लिए 'नो-ड्यूज' (No Dues) सर्टिफिकेट के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे। सरकार ने नियमों में ढील दी और अधिकारियों को देरी करने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। पढ़ें पूरी खबर।
मुंबई / छत्रपति संभाजीनगर: सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद एक कर्मचारी की सबसे बड़ी उम्मीद उसकी पेंशन और ग्रेच्युटी होती है, जो उसके बुढ़ापे का सहारा बनती है। लेकिन महाराष्ट्र में हजारों कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट का मतलब था—दफ्तरों के चक्कर काटना और 'नो-ड्यूज' (No Dues) सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए संघर्ष करना।
इस पीड़ा को समझते हुए, महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐतिहासिक और मानवीय फैसला लिया है। राज्य सरकार ने पेंशन प्रक्रिया को 'फास्ट-ट्रैक' (Fast-Track) करने के लिए विभिन्न विभागों से 'नो-ड्यूज' प्रमाण पत्र प्राप्त करने की अनिवार्य शर्त को खत्म कर दिया है।
यह फैसला राज्य के लाखों कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए किसी नए साल के तोहफे से कम नहीं है। आइए विस्तार से जानते हैं कि नए नियम क्या हैं और इससे आपको कैसे फायदा होगा।
क्या थी पुरानी समस्या? (The Problem)
अब तक की व्यवस्था के अनुसार, जब कोई कर्मचारी रिटायर होता था, तो उसे अपनी पेंशन और ग्रेच्युटी (Gratuity) की फाइल आगे बढ़ाने के लिए अलग-अलग विभागों से यह लिखवाकर लाना पड़ता था कि उस पर सरकार का कोई बकाया (Dues) नहीं है।
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इसमें आवास विभाग (Housing), जल विभाग, बिजली विभाग और अन्य अनुभाग शामिल होते थे।
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कई बार अधिकारी फाइलों को महीनों तक दबाए रखते थे या छोटी-मोटी आपत्ति लगाकर प्रक्रिया को रोक देते थे।
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नतीजा यह होता था कि रिटायरमेंट के बाद भी कर्मचारी को महीनों, और कभी-कभी तो सालों तक अपनी ही हक की कमाई के लिए भटकना पड़ता था।
नया नियम: 'सेवा पुस्तिका' ही होगी आधार
वित्त विभाग द्वारा जारी नए शासनादेश (Government Resolution - GR) के अनुसार, अब पेंशन के मामलों को केवल कर्मचारी की 'सेवा पुस्तिका' (Service Book) में उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निपटाया जाएगा।
नए बदलावों की मुख्य बातें:
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नो-ड्यूज की जरूरत नहीं: पेंशन स्वीकृत करने वाले अधिकारियों को अब अलग से 'नो-ड्यूज' सर्टिफिकेट मांगने की जरूरत नहीं है।
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विभाग की जिम्मेदारी: यह संबंधित विभाग की जिम्मेदारी होगी कि वह कर्मचारी के रिटायर होने से पहले ही चेक करे कि उस पर कोई बकाया है या नहीं।
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ऑटोमैटिक क्लीयरेंस: अगर रिटायरमेंट की तारीख तक विभाग की ओर से कोई 'बकाया सूचना' (Dues Intimation) नहीं आती है, तो यह मान लिया जाएगा कि कर्मचारी पर कोई बकाया नहीं है और उसकी पेंशन फाइल को रोका नहीं जाएगा।
शासकीय आवास (Govt Quarters) का क्या होगा?
अक्सर यह देखा गया है कि सरकारी आवास खाली न करने या उसका किराया बकाया होने के नाम पर पेंशन रोक दी जाती थी। नए नियमों में इसका भी समाधान निकाला गया है:
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यदि कोई कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी सरकारी आवास में रहता है या उस पर लाइसेंस फीस/किराया बकाया है, तो उसे 'नो-ड्यूज' के लिए पेंशन रोकने की जरूरत नहीं है।
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ऐसे मामलों में, सरकार सीधे उसकी ग्रेच्युटी (Gratuity) या पेंशन राहत (Pension Relief) की राशि से बकाया रकम वसूल लेगी, लेकिन पेंशन शुरू करने की प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जाएगा।
देरी करने वाले अफसरों की खैर नहीं!
इस बार सरकार ने सिर्फ नियम नहीं बदले हैं, बल्कि चेतावनी भी दी है। जीआर (GR) में साफ तौर पर कहा गया है कि पेंशन के मामले वरिष्ठ नागरिकों के जीवन से जुड़े होते हैं और इसमें संवेदनशीलता जरूरी है।
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कड़ी कार्रवाई: यदि कोई प्रशासनिक अधिकारी या विभागाध्यक्ष जानबूझकर पेंशन के कागजात तैयार करने में देरी करता है, या बिना किसी ठोस वजह के फाइल रोकता है, तो उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) की जाएगी।
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समय सीमा: सरकार ने निर्देश दिया है कि रिटायरमेंट के दिन ही कर्मचारी को उसके प्रोविजनल पेंशन (Provisional Pension) के आदेश मिल जाने चाहिए।
क्यों लिया गया यह फैसला?
यह फैसला रातों-रात नहीं लिया गया। कर्मचारी संगठन लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे।
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परेशानी: कई मामलों में देखा गया कि 100-200 रुपये की छोटी वसूली के लिए लाखों रुपये की ग्रेच्युटी रोक दी जाती थी।
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भ्रष्टाचार: 'नो-ड्यूज' सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए कई बार कर्मचारियों को रिश्वत देने या 'बाबूओं' की खुशामद करने पर मजबूर होना पड़ता था।
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मानसिक तनाव: जीवन भर सेवा करने के बाद बुढ़ापे में इस तरह की दौड़-भाग वरिष्ठ नागरिकों के लिए अपमानजनक थी।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, "हर साल लगभग 15,000 से 20,000 कर्मचारी रिटायर होते हैं। यह कदम यह सुनिश्चित करेगा कि वे सम्मान के साथ रिटायर हों, न कि फाइलों के बोझ तले दबकर।"
कर्मचारियों में खुशी की लहर
इस फैसले का राज्य भर के कर्मचारी संगठनों ने स्वागत किया है।
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शिक्षक संघ: शिक्षकों का कहना है कि वे अक्सर दूर-दराज के इलाकों में तैनात होते हैं और रिटायरमेंट के वक्त हेड ऑफिस से क्लीयरेंस लेना उनके लिए सबसे मुश्किल काम होता था। अब उन्हें बड़ी राहत मिलेगी।
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पेंशनर्स एसोसिएशन: पेंशनर्स संघ ने इसे "देर आए दुरुस्त आए" वाला कदम बताया है। उनका कहना है कि अब सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह आदेश सिर्फ कागज पर न रहे, बल्कि हकीकत में भी लागू हो।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र सरकार का यह कदम 'ईज ऑफ लिविंग' (Ease of Living) की दिशा में एक बेहतरीन उदाहरण है। तकनीकी जटिलताओं को हटाकर और भरोसे पर आधारित सिस्टम बनाकर सरकार ने अपने पूर्व कर्मचारियों को वह सम्मान दिया है जिसके वे हकदार हैं। अब उम्मीद है कि रिटायरमेंट का दिन कर्मचारियों के लिए चिंता का नहीं, बल्कि सुकून और नई शुरुआत का दिन होगा।